चायवाला

देश के अगले प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में शपथ ग्रहण की | उनके संपूर्ण चुनाव अभियान में सहयोगी हो या विपक्ष, सब एक बात की तो प्रशंसा करेंगे, और वो है “उनके परिश्रम करने की क्षमता” | उनकी इसी क्षमता को देखकर मुझे अनायास ही एक चायवाले की कहानी याद आ गयी | सुना है श्री मोदी भी पहले चायवाले ही थे और उनका अभियान भी पूर्णतः विकास और कर्म पर ही केंद्रित था | ऐसा ही कुछ था मेरी कहानी का चायवाला |

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सर्दियों की सुबह गंगा स्नान के बाद चाय की तलाश में मैं गंगा-पुत्र के पास गयी । उसने दूर एक खोखे की ओर इशारा किया, जो उस समय बन्द था। मैं सामने एक घर की सीढ़ियों पर बैठ खोखे के खुलने का इन्तजार करने लगी। थोड़ी देर में खोखेवाले ने खोखा खोल कर उसकी सफाई शुरू कर दी। मैंने गौर किया उसके खोखे में लगभग सभी धर्मों से सम्बन्धित कैलेंडर लटक रहे थे।

उसी समय वहाँ से एक मुस्लिम व्यक्ति को गुजरते देख उसने बड़ी गर्म जोशी से कहा “अस्सलाम अलैकुम” I उस व्यक्ति ने भी वालेकुम अस्सलाम कहते हुए पूछा “कैसे हो मियाँ?” “अल्लाह की मेहरबानी है।” खोखेवाले ने उत्तर दिया और चाय बनाने में व्यस्त हो गया।

मैं अभी चाय लेकर मुड़ी ही थी कि तभी एक पंडितजी उसके खोखे की ओर बढ़ते दिखाई दिए।”पंडित जी राम-राम”, खोखे वाले ने पूछा |

“राम-राम भइया और क्या हाल हैं?” पंडितजी ने उत्तर दिया |

“माँ गंगा और भगवान राम की कृपा से रोजी-रोटी चल रही है”, चायवाला बोला |

उसकी बात सुनकर मुझे कुछ हैरानी हुई। इतने में सड़क से गुजरते सरदार जी को उसने पुकारा, “सतश्री अकाल पाजी, चाह ता पी लो।”

“ला पिला दे पुत्तर, बिन पिए तू जाने कहाँ देगा”, सरदारजी ने उत्तर दिया |

उसी समय एक सफाई कर्मी अपनी झाड़ू एक ओर टिकाकर खोखे के बाहर पड़ी बेंच पर बैठकर चाय पीने लगा। दोनो में बड़ी मित्रता जान पड़ रही थी ।

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मैंने खाली गिलास वापस करते हुए उससे पूछा, “भइया तुम कौन धर्म के हो |”

मेरे इतना कहते ही वह चुटकी लेते हुए बोला, “बहनजी अब पूछने से क्या फायदा, चाय तो आप पी चुकी।” “मेरा वह मतलब नहीं था। दरअसल मैं तुम्हें सुबह से सभी से बातचीत करते देख भी रही हूँ और सुन भी रही हूँ, पर तुम्हारे हाव-भाव और व्यवहार से तुम्हारे धर्म और जाति का अनुमान नहीं लगा पा रही थी बस इसी असमंजस में पूछ लिया”, मैंने सकपका कर कहा |

वह चाय छानते हुए बोला “बहिन जी, हमारा छोटा सा चाय का धन्धा है | अगर हम यहाॅं जात बिरादरी लेकर बैठें तो हमारे बाल-बच्चे तो भूखे ही मर जाएँगे। कोई जात खाने को तो दे नहीं देती। मेरा धर्म है चायवाला, मैं चायवाला हूँ”, कह कर उसने एक लम्बी साँस ली।

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मेरे पुन: वही पूछने पर वह बड़ी शालीनता से बोला “हम अनपढ़ और जाहिल आदमी हैं,यह जात-धर्म तो सब पढ़े-लिखे और बड़े लोगों की चीज है। हम तो यह मानते हैै सबसे बड़ा धर्म है हमारी बनी चाय से गाहकों की सन्तुष्टि”, उसकी बात सुनकर मैं निरूत्तर हो गयी थी। कुछ और पूछना अब उचित नहीं लग रहा था। मैं घर जाने के लिए टैक्सी में बैठ गयी। मैं सोच रही थी कि जब चाय का छोटा सा खोखा चलाने वाला अनपढ आदमी भी इस बात को बखूबी समझ सकता है कि धर्म और जाति के आधार पर एक छोटा सा धन्धा भी नहीं चलाया जा सकता, तो देश चलाने वाले जो अपने आपको बहुत बुद्धिमान समझते हैं क्यों इस देश को धर्म और जातियों में बाँट कर चौपट कर रहे हैं।

उसी समय मुझे कक्षा ८ में पढ़ा हुआ कबीर का एक दोहा याद आ गया, जो कुछ इस तरह था:
“जात न पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तलवार का, पड़ी रेहन देयो म्यान |”

परन्तु सच पूछा जाए तो उसका मतलब मुझे आज समझ आया है |