भारत की आत्मा

मैं  परीक्षा  में  शामिल  बच्चों की  संख्या का आकलन करने एक  विद्यालय में पहुॅची। कम  उपस्थिति  देख मैंने वहाँ की प्रधानाध्यापिका से कम उपस्थिति के बारे में जानकारी की, तो उन्होंने बच्चों की कई समस्याओं के बारे में बताया। उसी समय एक बच्चे ने विद्यालय में प्रवेश किया जो परीक्षाओं में शामिल नहीं हो पा रहा था। उसे देखते ही प्रधानाध्यापिका ने कहा-  “मैडम यह अयूब है, विभिन्न प्रयासों के बाद भी यह बच्चा परीक्षा में शामिल नहीं हो रहा है, अब आप ही इसे समझाइए।”

मैंने उसे अपने पास बुला लिया और पूछा -“अयूब तुम परीक्षा क्यों नहीं दे रहे हो?”

वह बोला-“आने वाली बकरीद पर मेरी बहन की शादी है और मुझे रूपया इकट्ठा करना है।”मैंने उसे गौर से देखा, बारह-तेरह साल से ज्यादा उम्र नहीं लग रही थी उसकी। मैंने आश्चर्य से पूछा -“भला तुम कितने रूपये जोड़ लोगे।”

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वह बोला -” इससे पहले बड़ी बहन की शादी में मैंने तेरह हजार रुपये और अब्बा ने अट्ठारह हजार रुपए कमाए थे और अब फिर बहुत मेहनत करनी पड़ेगी, क्योंकि अब तो महँगाई और ज्यादा बढ़ गई है।”

मैं उस जिम्मेदार छोटे से भाई को देखकर गर्व से भर गयी। मैंने उससे कहा कि “आज मैं अपना कैमरा लाना भूल गयी हूॅ नहीं तो तुम्हारी फोटो खींच लेती, क्या तुम अपनी एक फोटो लाकर मुझे दे सकते हो।” “हाॅ “कहते हुए वह वहां से चला गया। थोड़ी ही देर बाद वह फ्रेम में एक जड़ी हुई एक लहर है तस्वीर लेकर लौटा।

मेरे यह पूछने पर कि  यह किसकी तस्वीर है, उसने तस्वीर मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा -” यह मेरे बहन-बहनोई हैं। इसी बहन का ब्याह किया था पिछले साल। “

कहते हुए उसने वह तस्वीर अपनी छाती से लगा ली, लेकिन उसकी आँखों में आँसू भर आए थे। उसकी भरी हुई आँखों को देखकर मेरा दिल भर आया। मैंने पूछा -” क्या तुम्हारी बहन कुछ परेशान है। “इतना सुनते ही वह तपाक से बोला -” सो तो खूब खुश है। इनकी ससुराल में चक्की है, ट्रैक्टर है बाग हैं।”कहते हुए वह फिर रोने लगा था। “फिर क्यों दु:खी हो इतने?” मेरी बात सुनकर वह फफक-फफक कर रो उठा और रोते हुए बोला – “मेरी सब बहनें एक दिन मुझसे दूर चली जाएॅगी। मैं अकेला रह जाऊॅगा, मुझे बहन की बहुत याद आती है।”

जब मैने अयूब से पूछा कि तुम क्या काम करके पैसे कमाते हो, तो वह बोला कि मैं ईंट गारा करता हूॅ, पुताई करता हूॅ, पेन्ट करता हूँ और लकड़ी चीरने तथा गिट्टी तोड़ने का भी काम कर लेता हूं, तभी तो मेरे हाथों में गाॅठे पड़ गई है।

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मैंने जब उससे कहा कि क्या यह सब बातें वह जिलाधिकारी महोदय के सामने कह सकता है तो वह तपाक से बोला में तो प्रधानमंत्री के भी सामने कह दूॅगा, पर फायदा कोई नहीं होगा, बहन मेरी है और पैसा भी मुझे ही कमाना होगा।

उसकी तड़प देखकर हम सभी की आॅखों से आॅसू बह निकले थे। मुझे लगा यही है भारत की आत्मा। भाई – बहन का वह अटूट बन्धन जिसमें किसी गवाही, किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है। यही संस्कृति भारत को विश्व में सर्वोच्च स्थान पर रखती है।

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