किसके भरोसे ?

कड़ाके की ठंड थी। सुबह से कई बार बाहर झांक कर देख चुकी थी। कोहरे के कारण इतनी हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी, सड़क पार कर दुकान से एक ब्रेड खरीद लाऊँ। कई बार खिड़की का पर्दा हटा और डाल चुकी थी। फिर मैंने ओवर कोट पहना। मफ़लर को कसकर कानों से गले तक लपेटकर दरवाजे के बाहर निकली।ताला लगाने में उँगलियाँ ठंड से जमने लगी। मैं फिर अन्दर गयी और हाथों में दस्ताने पहनकर दरवाज़ा बन्द करके दुकान की ओर चल दी।

मुश्किल से अभी बीस या पच्चीस कदम चल पायी थी, कि सामने से दो बच्चों आते दिखाई दिए। उन्हें देखकर ,इतने कपड़ों के बाद भी मेरे शरीर में एक बर्फ की लहर सी दौड़ गयी। अब तक वे दोनों मेरे नजदीक आ गए थे। एक लड़का, एक लड़की। लड़की ने एक फटी चढ्ढी और ऊपरी शरीर पर एक ढीला ब्लाउज़ पहन रखा था। पेट के ऊपर कसकर पकड़ने की वजह से उसकी पीठ और पेट दोनों ही खुले थे। उसके गालों पर आँसुओं की सूखी लकीरें बनी हुई थी।

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आँखों के आँसू अभी सूखे नहीं थे। ठंड से नाक बह रही थी। लड़के ने पूरे ब़दन पर कपड़ों के नाम पर केवल एक चढ्ढी पहन रखी थी। शायद उसमें इलास्टिक नहीं थी, इसलिये खिसकने के डर से उसने चढ्ढी को एक हाथ से पकड़ रखा था। दोनों की उम्र आठ-नौ वर्ष से अधिक नहीं होगी। मैंने लड़की से पूछा-

“तुम क्यों रो रही हो?”

“कुछ नहीं”

“कुछ तो, तुम्हारे आँसू क्यों निकल रहे हैं?” इतना सुनते ही लड़की और जोर से रोने लगी, पर लड़का बोला “हम बताएँ?”

“हाँ-हाँ तुम बताओ।”

“कबाड़ खरीदने वाले ने इसके जोर-जोर से थप्पड़ मारे हैं, इसीलिए रो रही है।” मैंने लड़की की ओर देखते हुए कहा-

“इसने कुछ शरारत की होगी।” लड़की को मेरी बात चुभ गयी।

“हमने कुछ नहीं किया, उल्टा उसने ही मेरा बहुत सारा कबाड़ लेकर बस दो रूपये दिए। कितने अँधेरे से हम दोनों कूड़ा बीन रहे थे, तुम्हें क्या मालूम।” लड़की आँसू पोंछते हुए कुछ गुस्से से बोली|

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“मेरा तो तुमसे बहुत ज्यादा था।मुझे भी तो दो ही रूपये दिए हैं।”

लड़के की बात सुनकर मैंने उससे कहा- “तुम्हें ज्यादा पैसे माँगने चाहिये थे,या उससे वापस लेकर किसी दूसरे के हाथ बेचना चाहिये था।”

“हम लोग यही तो कह रहे थे, कि या तो हम दोनों को पाँच-पाँच रूपये दे दो या हमारा कबाड़ा वापस कर दो,तभी तो उसने मारा।” लड़का चढ्ढी को कसकर पकड़ते हुए बोला।

“बस पाँच ही रूपये माँग रहे थे, क्यों?” मेरे चुप होते ही लड़की बड़े जोर से बोली- “तीन दिन से अम्मा को बुखार है, एक समय खाना मिलता था,कल तो वो भी नहीं मिला। अँधेरे से हम दोनों इसीलिए कूड़ा बीन रहे थे, कि पाँच-पाँच रूपये मिल जाएँगे तो पाव खा लेंगे, दो रूपये में तो मिलता नहीं है। “उसकी आँखें फिर भर आयीं थी। मैंने उसे समझाने के उद्देश्य से कहा- “इससे तो अच्छा था कि तुम वह कबाड़ अपनी अम्मा से बिकवाते।”

“तब तो यह दो रूपये भी नहीं मिलते। वे इनको घर की दूसरी जरूरतों पर खर्च करने की बात करतीं।”

उसकी बात सुनकर मेरे मन को गहरा धक्का लगा। सच में कितने अकेले हैं ये मासूम बच्चे। मेरी आँखें भर आयीं थीं, उनकी ओर दस का नोट बढ़ाते हुए मैं भी उन्हें अकेला छोड़ आगे बढ़ गयी।

 

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